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स्रोत: मूल रिपोर्ट, रूपनगढ़ न्यूज़ · प्रकाशक: Adi Parashakti Infotech Private Limited
नई दिल्ली/रूपनगढ़। वित्त वर्ष 2026-27 यानी निर्धारण वर्ष 2027-28 के लिए आयकर की स्लैब दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। नई कर व्यवस्था पात्र करदाताओं के लिए डिफ़ॉल्ट व्यवस्था बनी हुई है, यानी अगर आप ख़ुद चुनकर पुरानी व्यवस्था नहीं लेते तो आपकी गणना नई व्यवस्था में ही होगी। वेतनभोगी करदाताओं के लिए सबसे बड़ी राहत वही बनी हुई है जिसकी सबसे ज़्यादा चर्चा होती है, कि बारह लाख रुपये तक की कर योग्य आय पर प्रभावी रूप से कोई कर नहीं बनता।
लेकिन इस वाक्य को अक्सर आधा समझा जाता है। बारह लाख तक कर शून्य होने का कारण स्लैब नहीं, धारा 87A की छूट है। यह अंतर समझना ज़रूरी है, क्योंकि आय बारह लाख से ऊपर जाने पर गणित पूरी तरह बदल जाता है। यह लेख पूरा हिसाब आँकड़ों के साथ रखता है।
नई कर व्यवस्था की स्लैब दरें
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए नई कर व्यवस्था की स्लैब इस प्रकार हैं।
चार लाख रुपये तक की आय पर कोई कर नहीं।
चार लाख से आठ लाख रुपये तक की आय पर पाँच प्रतिशत।
आठ लाख से बारह लाख रुपये तक की आय पर दस प्रतिशत।
बारह लाख से सोलह लाख रुपये तक की आय पर पंद्रह प्रतिशत।
सोलह लाख से बीस लाख रुपये तक की आय पर बीस प्रतिशत।
बीस लाख से चौबीस लाख रुपये तक की आय पर पच्चीस प्रतिशत।
चौबीस लाख रुपये से ऊपर की आय पर तीस प्रतिशत।
नई व्यवस्था में बुनियादी छूट सीमा चार लाख रुपये है और सर्वोच्च दर तीस प्रतिशत है। इसके ऊपर चार प्रतिशत स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर अलग से लगता है।
पुरानी कर व्यवस्था की स्लैब
तुलना के लिए पुरानी व्यवस्था की दरें भी जान लेना ज़रूरी है। साठ वर्ष से कम आयु के व्यक्तिगत करदाता के लिए ढाई लाख रुपये तक कोई कर नहीं, ढाई लाख से पाँच लाख तक पाँच प्रतिशत, पाँच लाख से दस लाख तक बीस प्रतिशत, और दस लाख से ऊपर तीस प्रतिशत। इसमें भी चार प्रतिशत उपकर अलग से जुड़ता है।
पुरानी व्यवस्था की दरें ऊँची हैं, लेकिन उसमें धारा 80C के तहत डेढ़ लाख रुपये तक का निवेश, धारा 80D के तहत स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम, मकान किराया भत्ता और स्व-अधिकृत मकान के होम लोन ब्याज पर धारा 24(b) की कटौती जैसी छूटें उपलब्ध रही हैं। वेतनभोगी के लिए मानक कटौती पुरानी व्यवस्था में पचास हज़ार रुपये है।
बारह लाख तक कर शून्य कैसे बनता है
यहाँ दो अलग-अलग सुविधाएँ काम करती हैं और दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए।
पहली, वेतनभोगी करदाता नई व्यवस्था में पचहत्तर हज़ार रुपये की मानक कटौती यानी स्टैंडर्ड डिडक्शन का दावा कर सकते हैं। यह कटौती वेतन से सीधे घटती है और इसके लिए कोई निवेश या रसीद नहीं चाहिए।
दूसरी, धारा 87A के तहत पात्र निवासी व्यक्तियों को, जिनकी कर योग्य आय बारह लाख रुपये तक है, साठ हज़ार रुपये तक की कर छूट मिलती है। यह छूट कर की राशि से घटती है, आय से नहीं।
आँकड़ों से देखिए। मान लीजिए किसी वेतनभोगी की सकल आय बारह लाख पचहत्तर हज़ार रुपये है। मानक कटौती के बाद कर योग्य आय ठीक बारह लाख रुपये रह जाती है। स्लैब के हिसाब से इस पर कर बनता है साठ हज़ार रुपये। इसमें चार लाख तक शून्य, चार से आठ लाख पर पाँच प्रतिशत यानी बीस हज़ार, और आठ से बारह लाख पर दस प्रतिशत यानी चालीस हज़ार। कुल साठ हज़ार।
अब धारा 87A की छूट साठ हज़ार रुपये तक की है, जो इस पूरे कर को समाप्त कर देती है। कर शून्य हो जाने से उपकर भी शून्य हो जाता है। कुल देय कर शून्य।
यही वह गणित है जिसके आधार पर कहा जाता है कि बारह लाख तक कर शून्य है। ध्यान दें कि यह वेतनभोगी के लिए सकल आय बारह लाख पचहत्तर हज़ार तक काम करता है, क्योंकि मानक कटौती अलग से मिलती है।
बारह लाख से ऊपर जाने पर क्या होता है
यह वह बिंदु है जहाँ सबसे ज़्यादा भ्रम होता है। धारा 87A की छूट कर योग्य आय बारह लाख रुपये तक सीमित है। आय इससे ऊपर जाने पर यह छूट लागू नहीं होती, और तब पूरी स्लैब गणना के अनुसार कर बनता है, न कि केवल अतिरिक्त राशि पर।
पंद्रह लाख रुपये की सकल आय वाले वेतनभोगी का हिसाब देखिए। मानक कटौती के बाद कर योग्य आय चौदह लाख पच्चीस हज़ार रुपये। स्लैब के अनुसार कर बनता है तिरानवे हज़ार सात सौ पचास रुपये। धारा 87A की छूट यहाँ लागू नहीं होती। चार प्रतिशत उपकर जोड़ने पर यह तीन हज़ार सात सौ पचास रुपये बढ़ता है। कुल देय कर होता है सत्तानवे हज़ार पाँच सौ रुपये।
ऐसी स्थिति में सीमा से थोड़ी ही ऊपर आय वाले करदाताओं को अचानक बड़ी देनदारी से बचाने के लिए सीमांत राहत यानी मार्जिनल रिलीफ़ का प्रावधान रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि अतिरिक्त कर उस अतिरिक्त आय से ज़्यादा न हो जाए। इसकी सटीक गणना आपकी कुल आय पर निर्भर करती है, इसलिए सीमा के आसपास आय होने पर कर सलाहकार से हिसाब करवाना उचित है।
नई या पुरानी: पंद्रह और बीस लाख की आय पर असली तुलना
मान लीजिए करदाता पुरानी व्यवस्था में धारा 80C के पूरे डेढ़ लाख और धारा 80D के पच्चीस हज़ार, कुल एक लाख पचहत्तर हज़ार रुपये की कटौती का दावा कर सकता है।
पंद्रह लाख रुपये की सकल आय पर नई व्यवस्था में कुल कर सत्तानवे हज़ार पाँच सौ रुपये बनता है। पुरानी व्यवस्था में मानक कटौती पचास हज़ार और एक लाख पचहत्तर हज़ार की कटौती के बाद कर योग्य आय बारह लाख पचहत्तर हज़ार रह जाती है, और उपकर सहित कुल कर दो लाख दो हज़ार आठ सौ रुपये बनता है। यानी नई व्यवस्था में करीब एक लाख पाँच हज़ार तीन सौ रुपये की बचत।
बीस लाख रुपये की सकल आय पर नई व्यवस्था में कुल कर एक लाख बानवे हज़ार चार सौ रुपये और पुरानी व्यवस्था में तीन लाख अट्ठावन हज़ार आठ सौ रुपये बनता है। अंतर करीब एक लाख छियासठ हज़ार चार सौ रुपये।
यह तुलना एक बात साफ़ करती है। सामान्य कटौतियों के साथ ज़्यादातर वेतनभोगियों के लिए नई व्यवस्था सस्ती पड़ती है। पुरानी व्यवस्था तब फ़ायदेमंद हो सकती है जब कटौतियाँ बहुत बड़ी हों, जैसे कोई बड़ा होम लोन चुका रहा हो, महानगर में ऊँचा किराया दे रहा हो और 80C की पूरी सीमा भी इस्तेमाल कर रहा हो। हर व्यक्ति को अपने वास्तविक आँकड़ों पर दोनों का हिसाब लगाना चाहिए।
एक ज़रूरी चेतावनी। सिर्फ़ कर बचाने के लिए ऐसा निवेश न करें जो आपकी ज़रूरत का नहीं है। कर बचत निवेश का नतीजा होनी चाहिए, कारण नहीं। कई लोग केवल 80C की सीमा भरने के लिए लंबी अवधि की बीमा पॉलिसी ख़रीद लेते हैं जिसका रिटर्न कमज़ोर होता है और जिसे बीच में बंद करना महंगा पड़ता है।
टीडीएस और अग्रिम कर: वह हिस्सा जो नोटिस लाता है
कर केवल साल के अंत में नहीं चुकाया जाता। वेतन से हर महीने टीडीएस कटता है, और जिनकी कर देनदारी एक वित्त वर्ष में दस हज़ार रुपये से अधिक बनती है, उन्हें निर्धारित किस्तों में अग्रिम कर जमा करना होता है। यह नियम स्वरोज़गार करने वालों, किराये की आय वालों और पूँजीगत लाभ कमाने वालों के लिए ख़ास तौर पर मायने रखता है। समय पर अग्रिम कर न जमा करने पर ब्याज लगता है।
नियोक्ता को अपनी कर व्यवस्था का चुनाव समय पर बताना ज़रूरी है, ताकि टीडीएस उसी हिसाब से कटे और साल के अंत में एक साथ बड़ी राशि न कटे।
करदाता के लिए पाँच व्यावहारिक क़दम
पहला, फ़ॉर्म 26AS और वार्षिक सूचना विवरण मिलान करें। इसमें आपकी आय, कटा हुआ टीडीएस और बड़े लेनदेन दर्ज होते हैं। रिटर्न में आँकड़ा इससे भिन्न होने पर नोटिस आने की आशंका बढ़ती है।
दूसरा, बचत खाते के ब्याज, सावधि जमा के ब्याज और लाभांश को छिपाएँ नहीं। यह जानकारी विभाग के पास पहले से पहुँचती है।
तीसरा, घर के किराये की छूट का दावा करते समय वास्तविक भुगतान का प्रमाण रखें। बिना भुगतान के दावा करना जोखिम भरा है।
चौथा, शेयर या म्यूचुअल फ़ंड बेचने पर हुए पूँजीगत लाभ की जानकारी रिटर्न में दें, चाहे राशि छोटी हो।
पाँचवाँ, नियत तारीख़ से पहले रिटर्न भरें। देर से भरने पर शुल्क लगता है और कुछ नुक़सानों को आगे ले जाने का अधिकार समाप्त हो जाता है।
सामान्य सवाल
सवाल: क्या स्लैब में इस बार कोई बदलाव हुआ है?
जवाब: नहीं। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए नई और पुरानी दोनों व्यवस्थाओं की स्लैब दरें अपरिवर्तित बताई गई हैं।
सवाल: क्या मैं हर साल व्यवस्था बदल सकता हूँ?
जवाब: वेतनभोगी करदाताओं के लिए आम तौर पर हर साल चुनाव की सुविधा रही है, जबकि कारोबारी आय वाले करदाताओं पर अलग शर्तें लागू होती हैं। अपने मामले में पात्रता की पुष्टि कर सलाहकार से करें।
सवाल: मानक कटौती के लिए कोई प्रमाण देना होता है?
जवाब: नहीं। वेतनभोगी करदाता के लिए यह कटौती स्वतः उपलब्ध होती है, इसके लिए कोई रसीद या निवेश नहीं चाहिए।
सवाल: धारा 87A की छूट क्या सभी को मिलती है?
जवाब: यह पात्र निवासी व्यक्तियों के लिए है और कर योग्य आय की निर्धारित सीमा तक सीमित है। अनिवासी करदाता इसके दायरे में नहीं आते।
सवाल: शून्य कर बनता है तो रिटर्न भरना ज़रूरी है?
जवाब: कई स्थितियों में हाँ। अगर आपकी सकल आय बुनियादी छूट सीमा से ऊपर है, या कुछ विशेष लेनदेन हुए हैं, तो कर शून्य होने पर भी रिटर्न भरना अपेक्षित होता है। रिटर्न भरा होना कर्ज़ और वीज़ा आवेदन में भी काम आता है।
सवाल: नई व्यवस्था में कोई कटौती मिलती ही नहीं?
जवाब: ऐसा नहीं है। वेतनभोगी के लिए मानक कटौती उपलब्ध है, और नियोक्ता के अंशदान से जुड़ी कुछ कटौतियाँ भी उपलब्ध रहती हैं। लेकिन 80C, 80D और मकान किराया भत्ता जैसी लोकप्रिय छूटें इसमें नहीं मिलतीं।
स्रोत और ज़रूरी सूचना
इस लेख में दी गई स्लैब दरें, मानक कटौती और धारा 87A की छूट से जुड़ी जानकारी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सितंबर 2026 तक सार्वजनिक रूप से प्रकाशित जानकारी पर आधारित है। लेख में दिए गए कर के सभी आँकड़े इन्हीं स्लैब दरों, वेतनभोगी के लिए लागू मानक कटौती और चार प्रतिशत स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर के आधार पर गणना किए गए हैं। तुलना के उदाहरणों में पुरानी व्यवस्था के लिए एक लाख पचहत्तर हज़ार रुपये की कटौती मानी गई है, जो केवल उदाहरण है, हर करदाता की वास्तविक कटौती इससे भिन्न होगी।
कर कानून में संशोधन, अधिसूचनाएँ और स्पष्टीकरण समय-समय पर जारी होते हैं। यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है और कर सलाह नहीं है। किसी भी करदाता की वास्तविक देनदारी उसकी कुल आय, आय के स्रोत, निवास स्थिति, आयु, चुनी गई कर व्यवस्था और उपलब्ध कटौतियों पर निर्भर करती है। सीमांत राहत और अधिभार जैसी गणनाएँ व्यक्तिगत आँकड़ों पर निर्भर करती हैं।
रिटर्न भरने या कर नियोजन का कोई भी फ़ैसला लेने से पहले आयकर विभाग की आधिकारिक वेबसाइट incometax.gov.in पर मौजूदा प्रावधान देखें और योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट या पंजीकृत कर सलाहकार से अपने आँकड़ों पर परामर्श करें।
यह लेख रूपनगढ़ न्यूज़ डेस्क द्वारा पाठकों की व्यावहारिक जानकारी के लिए तैयार किया गया है। इसमें किसी वित्तीय संस्थान या सलाहकार से कोई प्रायोजन या भुगतान शामिल नहीं है।
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